अक्षय तृतीया किसी भी कार्य को करने के लिए बहुत ही शुभ मुहूर्त माना गया है इस दिन बिना पंचांग देखी सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं जैसे कि विवाह गृह प्रवेश नए वस्तुओं की खरीदारी वाहन जमीन घर आदि खरीद दी शास्त्रों से ज्ञात होता है कि इस दिन का दान महादान होता है जैसे कन्यादान पिंड दान आर गंगा स्नान कथा भगवत पूजन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते है आज अक्षय पुणे की प्राप्ति होती है इसीलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया है इसे आखा तीज भी कहते हैं यह वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है इसी दिन से ही विवाह जैसे शुभ कार्य प्रारंभ होते है ग्रामीण अंचलों तथा अन्य स्थानों पर भी गुड्डे और गुड़ियों की शादी विधि पूर्वक की जाती है बारात भी आते है और पूरे नियम से शादी की जाती है इस दिन पूरी तरह से शादी का माहौल होता है और पूरा इसमे सम्मिलित होता है इसीलिए इसे सामाजिक और सांस्कृतिक वाला त्यौहार कहते है


इस दिन मिट्टी के घड़े को दान देना बहुत ही लाभदायक माना गया है ब्राम्हण को पानी से भरा मिट्टी का घड़ा दान करना चाहिए साथ ही दाल चावल भी दान करना चाहिए
इस दिन स्वर्गीय आत्माओं की प्रसन्नता के लिए कलर्स पंखा खड़ा हो जाता सत्तू ककड़ी खरबूजा आदि पल्सर करा दी पदार्थ ब्राह्मण को दान करना चाहिए इस दिन चारों धामों में उल्लेखनीय श्री गंगोत्री धाम के पट खुलते हैं इसी दिन भक्तजनों को श्री गंगा जी व बद्री नारायण जी का चित्र सिहासन पर रखकर के मिस्त्री तथा चने की भीगी दाल से भोग लगाना चाहिए

पूजा करने की विधि

प्रातः काल स्नानादि करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए इसके बाद ब्राह्मण को पानी से भरा मिट्टी का घड़ा साथ ही फल फूल पैसे अन्न दान करना चाहिए साथ ही उन्हें भोजन करवाना चाहिए
यह तिथि पुण्यमयी है इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, तथा दान आदि करने वाला भाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है।

कथा

प्राचीन काल में सदाचारी ब्राह्म्णों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह हमेशा ही चिंतित रहता था उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना बाद में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की और जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, चावल,सोना तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान कीं स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हु यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई

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