यह उत्सव माघ शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाया जाता है यह पर्व वास्तव ऋतुराज बसंत की अगवानी की सूचना देता है इस दिन से ही होरी तथा धमार गीत प्रारंभ किए जाते हैं गेहूं तथा जौ की स्वर्णिम बालियां भगवान को अर्पित की जाती है
इस दिन भगवान विष्णु तथा सरस्वती की पूजा का विशेष फल है वसंत ऋतु कामोद्दीपक होता है इसलिए चरक संहिता कार का कथन है कि इस ऋतु में स्त्रियों तथा वनों का सेवन करना चाहिए इसके प्रमुख देवता काम तथा रहती हैं अतः काम तथा रति की प्रधानता पूजा करनी चाहिए

स्कुलो में कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते है और माता सरस्वती की विधि पूर्वक पूजा की जाती है

कथा

भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापति ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करके जब उसे संसार में देखते हैं तो चारों और सुनसान निर्जन ही दिखाई देता था उदासी से यह सारा वातावरण मुक सा गया था जैसे कि किसी के वाणी ना हो या देखकर ब्रह्माजी ने उदासी तथा मलिनता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल छिड़का उन जल कणों के पड़ते ही वृक्षों में एक शक्ति उत्पन्न हुई जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी तथा दोनों हाथों में क्रमशः पुस्तक तथा माला धारण किए थे ब्रह्मा जी ने उस देवी से वीणा बजाकर संसार की मूकता तथा उदासी दूर करने को कहा
तब उस देवी नहीं वीणा की मधुर नाथ से सभी जीवो को वाणी प्रदान की इसलिए उस देवी को सरस्वती कहां गया या देवी विद्या बुद्धि को देने वाली है इसीलिए बसंत पंचमी के दिन घरों में माता सरस्वती की पूजा की जाती है।

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