रक्षाबंधन हिंदू धर्म का बहुत ही मुख्य और पवित्र त्योहार माना जाता है जिसमें बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं जो स्नेह से भरा डोर होता है और भाई उनकी रक्षा करते है

यह त्यौहार श्रवण की पूर्णिमा को मनाया जाता है रक्षाबंधन का अर्थ है रक्षा +बंधन अर्थात किसी को अपनी रक्षा के लिए बांधने लेना राखी बांधते समय बहन कहती है है भैया मैं तुम्हारी शरण में हूं मेरी सब प्रकार से रक्षा करना एक बार भगवान श्री कृष्ण के हाथ में चोट लग गई थी तथा खून गिरने लगा था जब द्रोपदी ने देखा तो वह तुरंत होती का छोड़ छाड़ कर भाई के हाथ में बांध दी इसी बंधन के ऋण स्वरूप कृष्ण ने दुशासन द्वारा चीर खींचते समय द्रौपदी की लाज रखी थी

मध्यकालीन इतिहास में एक ऐसी घटना घटी है जिसमें चित्तौड़ की हिंदू रानी कर्मावती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मान कर उसके पास राखी भेजी थी कुमाऊनी कर्णावती की राखी स्वीकार कर ली और उसके सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के बादशाह से युद्ध किया।

पौराणिक कथा

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा – हे अच्युत! मुझे रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइए जिसमें मनुष्यों की प्रेत बाधा तथा दुख दूर होता है इस पर भगवान ने कहा हे पांडव श्रेष्ठ प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में 12 वर्षों तक युद्ध हुआ इस संग्राम में देवराज इंद्र की पराजय हुई देवता कांति विहीन हो गए इंद्र निष्फल छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि देकर देवताओं सहित अमरावती में चला गया
विजेता दैत्य राज ने तीनों लोगों को अपने वश में कर लिया उसने राज मत से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में ना आए तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ कर्म ना करें सब लोग मेरी पूजा करें जिसको इसमें आपत्ति हो वह राज्य छोड़कर चला जाए दैत्य राज की इस आज्ञा से वेद पठन पाठन तथा उत्सव समाप्त कर दिए गए धर्म के नाश होने से देवों का बल घटने लगा इधर इंद्र दमोह से भयभीत हो बृहस्पति को बुलाकर कहने लगा हे गुरु मैं शत्रुओं से गिरा हुआ राणा संग्राम करना चाहता हूं होनहार बलवान होती है जो होना होगा हो कर रहेगा पहले तो बृहस्पति ने समझाया कि रोक करना व्यर्थ है परंतु इंद्र की हटवा दी तथा उत्साह देकर रक्षा विधान करने को कहा

श्रावण पूर्णिमा के प्रातः काल ही रक्षा का विधान संपन्न किया गया सहधर्मिणी इंद्राणी के साथ वृत्र सहारा केंद्र ने बृहस्पति की उस्मानी को अक्षर से पालन किया इंद्राणी ने ब्राह्मण पूर्वजों द्वारा स्वास्थ्य भोजन कराकर इंद्र के दाएं हाथ में रक्षा की पोटली को बांध दिया इसी के बल पर इंद्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की।

श्रावणी कर्म- कृषि प्रधान भारत का सांस्कृतिक इतिहास बताता है कि श्रावण पूर्णिमा आज आने पर कृषक भाभी फसल के लिए आसान होता है क्षत्रिय दिग्विजय यात्रा से विरत होते हैं तथा व्यस्य वाणिज्य व्यापार से आराम पाते हैं साधु सन्यासी योगी वर्षा के कारण 1 स्त्रियों का परित्याग करके बस्तियों के समीप आकर धर्मो देश में चौमासा व्यतीत करते हैं इस प्रकार श्रद्धालु भक्त ज्ञान सुनकर अपने समय का सदुपयोग करते थे ऋषि लोग वेद परायण करके अपनी तपस्या को सफलता की ओर ले जाते थे इस प्रकार वेद परायण के इस शुभारंभ को उपा कर्म कहा जाता था यह कर्म श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आरंभ होता था इस प्रकार श्रावणी के पहले दिन अध्ययन का श्रीगणेश होता था।

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